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Tuesday, May 1, 2007
तनहाई
एक ठण्डी हवा का ज़्होका भी, मुजे आग कि तरह लगता था,
सुबह कि वो नरम धुप काटो सी चुभन देती थी,
जब भी तेरी याद अति, तो दुनिया सुनसान लगती थी,
भीड़ कै बिच बेठा रहता था, फिर भी तनहाई ड्स्ती थी।
राहुल वी शाह
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